उत्तर प्रदेश की शाहजहांपुर की अनोखी लाट साहब की होली – जूते-चप्पलें से मारा जाता है, लाट साहब कों
मनु टाइम्स – सच्चाई की आवाज
होली के अवसर पर विक्रम राणा की खास रिर्पोट
जब होली की बात होती है तो लोगों को मथुरा, वृंदावन ,बरसाने की होली के बारे में बात करते है। मगर यहां मैं उत्तर प्रदेश की एक और निराली होली के बारे में बताऊंगा जो काफी अनोखे ढंग से मनाई जाती है।
होली पर लाट साहब का जुलूस –
उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर शहर में मनाई जाने वाली होली पर लाट साहब का जुलूस निकाला जाता है। यह परम्परा 300 साल पुरानी है। इस होली के बारे में बता दूं जिसके बारे मे बहुत कम लोगों ने सुना होगा । यूपी के शाहजहांपुर की होली यह काफी अनोखे ढंग से मनाई जाती है, यहाँ इसे जूता मार होली कहते हैं । होली के दिन शहर में लाट साहब का जुलूस निकलता है। शाहजहांपुर शहर में लाट साहब का जुलूस निकलता हैं इनमें एक शख्स को लाट साहब बनाकर भैसा बग्गी में बैठाया जाता है ,और फिर इस दौरान लोग लाट साहब पर जूते फेंक कर मारते हैं। इस जुलूस में भारी भीड़ होती है ।
बताते हैं अंग्रेजों के प्रति अपना आक्रोश प्रकट करने के लिए यहां एक व्यक्ति को अंग्रेजो का प्रतीक लाट साहब बनाकर उसे भैसा बग्गी में बैठाया जाता है, और फिर जूते और झाड़ू से पीटा जाता है, लोग अपनी.अपनी छत पर से भी जूते की बरसात लाट साहब पर करते हैं ।यह परंपरा यहां कई दशक से चलती चली आ रही है।
जिस पुरुष को लाट साहब बनाया जाता है उसको एक दिन पहले अत्यधिक शराब का सेवन कराया जाता है और उसको हेलमेट पहनाकर पूरे शहर में घुमाया जाता है। जहां लोग उसके सिर पर जूते मारते हैं, इसको देखने इसको देखने के लिए आस पड़ोस के कई जिलों से लोग आते हैं । जुलूस के समय सभी धार्मिक स्थल का ढ़क दिया जाता है। जुलूस आखिर में थाने पहुॅचता है, और थानेदार से पूरे साल का क्राइम का रिकार्ड मांगते है। थानेदार रिकॉर्ड देने से मना कर देता है, और लाट साहब को खुश करने के लिए 21 हजार रूपेय दिये जाते है और एक दारू की बोतल देते है, और सलाम भी करते है। उसके बाद लाट साहब चले जाते है। कहॉ जाता है कि लाट साहब को नाराज नही किया जाता है।
300 साल पुरानी परंपरा
जुलूस के आयोजकों का कहना है कि लाट साहब की तलाश होली से एक महीने पहले शुरू कर दी जाती है। लाट साहब बनाए गए शख्स को गुप्त स्थान पर रखा जाता है और उसके खाने.पीने का पूरा ख्याल रखा जाता है। स्वामी शुकदेवानंद कॉलेज में इतिहास विभाग के अध्यक्ष डॉक्टर विकास खुराना ने कहा कि शाहजहांपुर शहर की स्थापना करने वाले नवाब बहादुर खान के वंश के आखिरी शासक नवाब अब्दुल्ला खान पारिवारिक विवाद के चलते फर्रुखाबाद चले गए थे और वर्ष 1729 में 21 वर्ष की उम्र में वह शाहजहांपुर वापस आए थे। एक बार होली के पर्व पर हिंदू और मुस्लिम दोनों ही धर्मों के मानने वाले लोग होली खेलने उनके घर गए। नवाब ने उनके साथ होली खेली। बाद में नवाब को ऊंट पर बैठाकर पूरे शहर का एक चक्कर लगाया गया। तब से यह परंपरा बन गई।
आजादी के बाद जूते मारने का रिवाज आया
पहले ये जुलूस बहुत ही तहजीब के साथ निकाला जाता था मगर आजादी के बाद इस जुलूस का नाम लाट साहब का जुलूस रख दिया गयाण् अंग्रेजी शासन में आमतौर पर गवर्नर को लाट साहब कहा जाता था। बाद में लाट साहब बने व्यक्ति को जूते मारने का रिवाज शुरू हो गया जिस पर आपत्ति भी दर्ज कराई गई और मामला कोर्ट पहुंचा। मगर अदालत ने इस पर रोक लगाने से इंकार कर दिया।







